ईश्वर की आज्ञा: 3 मुख्य नियम एवं समर्पण का धर्म | Shiv Guru Charcha

आज के समय में ईश्वर की आज्ञा के आध्यात्मिक रहस्य को समझना अत्यंत आवश्यक है। शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) के अनुसार जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक जीवन में स्थायी शांति पाना कठिन है।

ईश्वर की आज्ञा

साहेब श्री हरींद्रानंद जी ने विश्व के समक्ष यह शाश्वत विचार प्रस्तुत किया कि भगवान शिव ही हर मानव के प्रथम और अंतिम गुरु हैं। शिव को अपना गुरु बनाने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। केवल निश्छल मन और गुरु की दया की चाह ही पर्याप्त है।

जब साधक प्रतिदिन शिव से दया माँगता है, अन्य लोगों से शिव की गुरुता की चर्चा करता है, और नमः शिवाय का जप करता है, तो उसका जीवन बदल जाता है। शिव की दया हर परिस्थिति में शिष्य का संबल बनती है।

जहाँ तक मेरी समझ है, सारे पैगम्बरों या ऋषियों का एक ही सन्देश है कि,
“ईश्वर की आज्ञा माननी चाहिये”।

अब गौर कीजिए आज्ञा पालन करने वाला ही शिष्य हो सकता है। ईश्वर की आज्ञा पालन करना ही धर्म है जिसे अलग भाषा में इस्लाम कहा गया है।

जैसे कहा जाता है कि धर्म का अर्थ संप्रदाय नहीं है, उसी तरह कहा जाता है कि इस्लाम कोई फिरका नहीं है।

अब देखिये कि अल्लाह का हुक्म मानने वाले को मुस्लिम कहा गया है और ईश्वर की आज्ञा पालन करनेवाला ही शिव-शिष्य है।

तो हम देखते हैं कि “सत्य” एक ही है, चाहे उसे जो देखे, जब देखे। Truth is the same thing, whoever sees it, whenever sees it. “सत्य हमेशा अपरिवर्तित रहता है”।

जो कभी नहीं बदलता उसे ही सनातन कहते हैं।

इसीलिये कहा गया है कि, “सत्यमेकं मुनिर्बहुधा वदन्ति”। सत्य एक ही है, मुनि अलग अलग तरीके से बोलते हैं। (ये अलग बात है कि, लोगों ने सन्देश की जगह संदेशवाहकों को ही पकड़ लिया। अगर सन्देश को पकड़ते तो मेरा तेरा नहीं होता, क्योंकि सन्देश तो एक ही है।)

सत्य की समझ केवल ईश्वर की दया से प्राप्य है।

दिक्कत यह है कि लोग ईश्वर के भोगदाता स्वरुप से जुड़े हुए हैं, मोक्षदाता स्वरुप से नहीं। अर्थात लोग ईश्वर से केवल भौतिक वस्तुओं की कामना करते हैं, समझ या ज्ञान की नहीं।

जब समझ ही नहीं रहेगी तो हमें कैसे ज्ञान होगा कि ईश्वर क्या चाहते हैं? ईश्वर की आज्ञा क्या है?

हमारा आपका मन जागतिक आकर्षण में बंधा हुआ होने की वजह से इस दिशा में चलता ही नहीं।

स्वाभाविक रूप से हमारा आपका मन जगत से जुड़ा हुआ है, जगदीश्वर से नहीं।

हमारा आपका मन ईश्वर से जुड़ जाए, जो जगद्गुरु भी हैं, उसे “अपना” मान ले, इसके लिये, शिव-गुरु की दया से, मानव-जाति को, शिव-गुरु की दया से 3 सूत्र सहायक हैं।

ये उसी तरह है, जैसे एक समय संवादों का आदान-प्रदान चिट्ठियों के माध्यम से होता था, फिर लैंडलाइन फोन आ गए, उसके बाद मोबाइल और अब इंटरनेट।

लौकिक संवादों के आदान-प्रदान के लिए उत्तरोत्तर साधनों का विकास हुआ है और लोगों ने थोड़ी हिचक के बाद आधुनिकतम साधनों को स्वीकार कर लिया और पुराने साधन पीछे छूटते गए।

ठीक उसी प्रकार यहाँ भी हो रहा है।

ये अलग बात है कि, यहाँ अज्ञात से संपर्क स्थापित करना है, इसीलिये हिचक या अविश्वास भी ज्यादा है, जो स्वाभाविक है।

जांचने के ख़याल से भी 3 सूत्रों के माध्यम से ईश्वर के साथ गुरु-शिष्य का संबंध, सहज परिणामदायी है और विश्वास तो परिणाम मिलने के बाद ही आएगा।

ईश्वर के गुरू स्वरुप से जुड़ने के लिये भी, शिव-गुरु की दया से, मानव-जाति को, शिव-गुरु की दया से 3 सूत्र सहायक हैं।

1. दया मांगना:

“हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये” (मन ही मन)

2. चर्चा करना:

दूसरों को भी यह सन्देश देना कि, “शिव मेरे गुरु हैं, आपके भी हो सकते हैं”

3. नमन करना:

अपने गुरु को प्रणाम निवेदित करने की कोशीश करना। चाहें तो नमः शिवाय का प्रयोग कर सकते हैं। (मन ही मन, सांस लेते समय नमः तथा छोड़ते समय शिवाय)

मुख्य बिंदु (Key Takeaways – ईश्वर की आज्ञा)

  • शाश्वत सत्य: ईश्वर की आज्ञा का बोध जीवन में शांति प्रदान करता है।
  • शिव गुरु: शिव को गुरु मानकर दया माँगने से जीवन के कष्ट मिटते हैं।
  • 3 सूत्र: दया माँगना, चर्चा करना और नमः शिवाय जप ही शिव शिष्यता का सहज साधन है।

विशेष आध्यात्मिक संदेशों के लिए शिव शिष्य हरींद्रानंद फाउंडेशन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएँ। अधिक लेखों के लिए शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) पर नियमित पधारें।

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