आज के समय में धर्म संस्कृति और संप्रदाय के आध्यात्मिक रहस्य को समझना अत्यंत आवश्यक है। शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) के अनुसार जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक जीवन में स्थायी शांति पाना कठिन है।

साहेब श्री हरींद्रानंद जी ने विश्व के समक्ष यह शाश्वत विचार प्रस्तुत किया कि भगवान शिव ही हर मानव के प्रथम और अंतिम गुरु हैं। शिव को अपना गुरु बनाने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। केवल निश्छल मन और गुरु की दया की चाह ही पर्याप्त है।
जब साधक प्रतिदिन शिव से दया माँगता है, अन्य लोगों से शिव की गुरुता की चर्चा करता है, और नमः शिवाय का जप करता है, तो उसका जीवन बदल जाता है। शिव की दया हर परिस्थिति में शिष्य का संबल बनती है।
अक्सर लोग कहते हैं कि सनातन धर्म। जैसे कि कई धर्मों में से एक धर्म, सनातन धर्म भी है। कुछ लोग समझते हैं कि, हिंदू भी एक धर्म है।
वास्तव में सनातन धर्म नहीं, धर्म सनातन होता है।
धर्म का मतलब क्या है?
“धारयति इति धर्मः”
अर्थात्, “जो धारण किया जाता है, वही धर्म है।
इसका तात्पर्य गुण से भी है और फर्ज यानी कर्तव्य से भी है।
जैसे कि अग्नि का धर्म है जलाना, पानी का धर्म है भिगोना और हवा का धर्म है सुखाना।
धर्म का तात्पर्य कर्तव्य से भी है। मानव का एकमात्र धर्म है, मानवता।
अगर 4 कुत्ते एक जगह हैं और उनमें से 1 कुत्ता बहुत तगड़ा है। बाँकी 3 कुत्ते कमजोर हैं। तभी उनके बीच कोई रोटियां डाल कर चला जाता है, तो जो सबसे तगड़ा कुत्ता है, वह अकेले सारी रोटियां खा जायेगा। भले ही उसने अभी कुछ देर पहले ही खाया है और बाकी कुत्ते बहुत समय से भूखे हैं।
वहीँ अगर 4 आदमी बहुत समय से भूखे हैं और उनके बीच 1 आदमी के लायक ही खाना पहुँचता है, तो जो सबसे मजबूत आदमी है, वह सबसे कमजोर आदमी को सबसे पहले खिलायेगा। अगर उसमें मानवता है तो।
यही मानवता, मानव का धर्म है और यह नियम सनातन है। सनातन का अर्थ होता है, जो कभी भी नहीं बदलता। हर कालखंड में एक जैसा रहे।
रह गई बात हिन्दू की, तो यह एक संस्कृति है, धर्म नहीं।
“किसी भी मानव समुदाय के लंबे जीवनकाल में जो जीवनमूल्य उत्पन्न होते हैं, उन्हें ही संस्कृति कहते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि, कई तथाकथित धर्म, धर्म नहीं, संस्कृति हैं।
अब रह गई बात संप्रदाय की, तो संप्रदाय का अर्थ होता है, एक ही चीज देने वाली। यानी पद्धतियाँ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन परिणाम एक ही होगा। साधन अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन साध्य एक ही होगा।
कुछ लोग कहते हैं कि, साधन से क्या होता है, साध्य तो एक ही है!
लेकिन जरा सोचिये, बैलगाड़ी, रेलगाड़ी और हवाई-जहाज अलग अलग साधन हैं और लंबी यात्रा पर जाना है, मान लेते हैं, दिल्ली से न्यूयार्क। क्या परिणाम एक ही होगा?
कोई पिता अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है, और उसका पुत्र विदेश में रहता है। एक चिट्ठी भेजी जाती है या एक ईमेल किया जाता है या एक कॉल की जाती है, क्या परिणाम एक ही होगा?
तो जैसे जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ है, वैसे वैसे हमारे साधन विकसित हुए हैं।
जिस प्रकार पारंपरिक चिट्ठियों की जगह, मोबाइल और इंटरनेट ने ले ली है उसी तरह अध्यात्म में भी साधनों की खोज हुई है। ये अलग बात है कि, इस मामले में हमारी सोच पीछे की तरफ ही मुड़ी हुई है। इस मामले में ही इतना कट्टरवाद क्यों?
तो आइये, आज के परिवेश में, आज के मनुष्य के लिये उपयुक्त 3 सूत्रों के माध्यम से, हम सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा यानि ईश्वर अर्थात शिव से 1 रिश्ता जोड़ें। गुरू शिष्य का रिश्ता।
ईश्वर के गुरू स्वरुप से जुड़ने के लिये भी, शिव-गुरु की दया से, मानव-जाति को, शिव-गुरु की दया से 3 सूत्र सहायक हैं।
1. दया मांगना-
“हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये” (मन ही मन)
2. चर्चा करना-
दूसरों को भी यह सन्देश देना कि, “शिव मेरे गुरु हैं, आपके भी हो सकते हैं”
3. नमन करना-
अपने गुरु को प्रणाम निवेदित करने की कोशिश करना। चाहें तो नमः शिवाय का प्रयोग कर सकते हैं। (मन ही मन, सांस लेते समय नमः तथा छोड़ते समय शिवाय)
करके देखा जाए। मुझे बहुत ही सुन्दर परिणाम मिले हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways – धर्म संस्कृति और संप्रदाय)
- शाश्वत सत्य: धर्म संस्कृति और संप्रदाय का बोध जीवन में शांति प्रदान करता है।
- शिव गुरु: शिव को गुरु मानकर दया माँगने से जीवन के कष्ट मिटते हैं।
- 3 सूत्र: दया माँगना, चर्चा करना और नमः शिवाय जप ही शिव शिष्यता का सहज साधन है।
विशेष आध्यात्मिक संदेशों के लिए शिव शिष्य हरींद्रानंद फाउंडेशन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएँ। अधिक लेखों के लिए शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) पर नियमित पधारें।
