साध्य और साधन: 3 मुख्य तात्विक भेद एवं विवेक

साध्य और साधन में क्या अंतर है? जानिए शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) में 3 मुख्य तात्विक भेद, जीवन का परम साध्य और शिव शिष्यता का साधन।

आज के समय में साध्य और साधन के आध्यात्मिक रहस्य को समझना अत्यंत आवश्यक है। शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) के अनुसार जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक जीवन में स्थायी शांति पाना कठिन है।

साध्य और साधन: 3 मुख्य तात्विक भेद एवं विवेक

साहेब श्री हरींद्रानंद जी ने विश्व के समक्ष यह शाश्वत विचार प्रस्तुत किया कि भगवान शिव ही हर मानव के प्रथम और अंतिम गुरु हैं। शिव को अपना गुरु बनाने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। केवल निश्छल मन और गुरु की दया की चाह ही पर्याप्त है।

जब शिष्य प्रतिदिन शिव से दया माँगता है, अन्य लोगों से शिव की गुरुता की चर्चा करता है, और नमः शिवाय से अपने गुरू को प्रणाम करने की कोशिश करता है, तो उसका जीवन बदल जाता है। शिव की दया हर परिस्थिति में शिष्य का संबल बनती है।

साध्य और साधन में क्या अंतर है?

कुछ लोग कहते हैं साधन से कोई फर्क नहीं पड़ता,
साध्य सही होना चाहिए।

खासकर आध्यात्मिक चर्चा जब भी होती है, कुछ लोगों के पास रटा रटाया जवाब होता है, अरे जाना तो वहीँ है न, मार्ग और साधन से क्या फर्क पड़ता है?

बहुत दिनों तक मैं भी ऐसा ही विचार रखता था।

लेकिन जरा सोचिए:

एक पिता बहुत बीमार है और उसका पुत्र देश के दूसरे कोने में रहता है। एक चिठ्ठी लिखी जाती है और उसे साधारण डाक से भेज दिया जाता है। चिठ्ठी रास्ते में गुम हो जाती है या पहुँचती भी है तब, जब पिता की मृत्यु हो जाती है। वहीँ चिट्ठी की जगह तार किया जाता है, मेल किया जाता है या सीधे फोन कर दिया जाता है।
क्या परिणाम एक ही होगा?

एक और उदाहरण लेते हैं।

किसी को गुवाहाटी से दिल्ली जाना है।
वह बैलगाड़ी से चलता है, या रेलगाड़ी से चलता है, या हवाई जहाज से चलता है।
क्या परिणाम एक ही होगा?

अगर मंजिल दिल्ली की जगह अमेरिका हो, या अगर मंजिल अंतरिक्ष में जाना हो?

हमने भौतिक जीवन में अपने साधन लगातार बदले हैं, लेकिन बात जब आध्यात्मिक साधन की हो, तो फिर वही रटा रटाया जवाब !!!
हद है।

क्या यह बैकवर्ड सोच नहीं है?
अधिकांश लोगों के यही हालात हैं।

इनमें वो लोग भी शामिल हैं, जो स्मार्टफोन, कंप्यूटर, इंटरनेट जैसे, संचार के आधुनिक साधनों का इस्तेमाल करते हैं और तथाकथित आधुनिक विचारधारा वाले लोग हैं।

आखिर अध्यात्म के मामले में ही हमारी सोच इतनी बैकवर्ड क्यों हो जाती है?
इस मामले में ही, हम इतने अतीतप्रेमी क्यों हो जाते हैं?
इतना कट्टरवाद क्यों?

अध्यात्म में प्रयोग क्यों नहीं हो रहे हैं? या नए प्रयोगों को क्यों नहीं स्वीकार किया जाता है?
जबकि यह मंजिल तो अंतरिक्ष में जाने की तुलना में भी बहुत ज्यादा महान है!

परिवर्तन संसार का स्वाभाविक नियम है

मित्रो, जिस तरह भौतिक साधनों के मामले में, मानवीय चेतना ने बहुत ज्यादा विकास किया है, उसी तरह अध्यात्म के मामले में भी मानवीय चेतना ने अभूतपूर्व विकास किया है और चेतना के उच्चतम तलों को छुआ है। और यही होना था। क्योंकि विकास एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और परिवर्तन संसार का स्वाभाविक नियम है।

ये अलग बात है कि, इस क्षेत्र में परिवर्तन का सबसे अधिक विरोध होता है।

इस कालखंड के लिए उपयुक्त साधन:

तो आइये इस कालखंड के प्रथम शिव-शिष्य, वरेण्य गुरू भ्राता, साहबश्री हरींद्रानंद जी के माध्यम से मनुष्य जाति को ईश्वर की अनुपम भेंट, “3 सूत्र” का पालन कर हम और आप ईश्वर से गुरू-शिष्य का रिश्ता जोड़ें और मानवीय चेतना को अप्रतिम ऊंचाइयों पर ले चलें।

क्योंकि इस संसार की लगभग सभी समस्याओं का मूल कारण है, ” मानवीय चेतना का अल्प विकास”…

3 सूत्र:

शिव को “अपना” गुरु बनाने के लिए, शिव-गुरु की दया से, शिव-गुरु की दया से 3 सूत्र दिए गए हैं…

1. दया मांगना-

“हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये” (मन ही मन)

2. चर्चा करना-

दूसरों को भी यह सन्देश देना कि, “शिव मेरे गुरु हैं, आपके भी हो सकते हैं”

3. नमन करना-

अपने गुरु को प्रणाम निवेदित करने की कोशिश करना। चाहें तो नमः शिवाय का प्रयोग कर सकते हैं। (मन ही मन, सांस लेते समय नमः तथा छोड़ते समय शिवाय)

मुख्य बिंदु (Key Takeaways – साध्य और साधन)

  • शाश्वत सत्य: साध्य और साधन का बोध जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।
  • शिव गुरु: शिव गुरु की दया से शिष्य के लौकिक और पारलौकिक मनोरथ स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।
  • 3 सूत्र: दया माँगना, चर्चा करना और नमः शिवाय से अपने गुरु को प्रणाम निवेदित करने की कोशिश करना ही शिव शिष्यता का सहज साधन है।

विशेष आध्यात्मिक संदेशों के लिए शिव शिष्य हरींद्रानंद फाउंडेशन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएँ। अधिक लेखों के लिए शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) पर नियमित पधारें।

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