आज के समय में ज्ञान और समझ के आध्यात्मिक रहस्य को समझना अत्यंत आवश्यक है। शिव गुरु चर्चा (Shiv Guru Charcha) के अनुसार जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक जीवन में स्थायी शांति पाना कठिन है।

साहेब श्री हरींद्रानंद जी ने विश्व के समक्ष यह शाश्वत विचार प्रस्तुत किया कि भगवान शिव ही हर मानव के प्रथम और अंतिम गुरु हैं। शिव को अपना गुरु बनाने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। केवल निश्छल मन और गुरु की दया की चाह ही पर्याप्त है।
जब साधक प्रतिदिन शिव से दया माँगता है, अन्य लोगों से शिव की गुरुता की चर्चा करता है, और नमः शिवाय का जप करता है, तो उसका जीवन बदल जाता है। शिव की दया हर परिस्थिति में शिष्य का संबल बनती है।
प्रयास:
जहाँ तक मेरी समझ है,
ज्ञान जब बोध में उतर जाए, अर्थात् मन समझ जाये तभी वह कारगर होता है और इसी को बोधात्मक ज्ञान कहते हैं।
बोल रहे हैं पर समझ नहीं रहे हैं, इसे वागात्मक ज्ञान कहते हैं।
जैसे कि “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, ‘लोभ’ से उसमें फंसना नहीं”, सभी तोते रट रहे थे लेकिन समझ नहीं रहे थे, इसीलिए “लोभ” में फंस गए।
अब ये वाक्य तोतों के लिए वागात्मक ज्ञान था, लेकिन जिस व्यक्ति ने तोतों को यह वाक्य रटाया था उसके लिये बोधात्मक था।
तो ज्ञान तो ज्ञान ही है, निर्भर करता है, “ग्रहण करने की पात्रता” पर।
मेरे विचार से ग्रहण करने की पात्रता (समझदानी का कटोरा) को ही “समझ” कहते हैं।
तो वास्तविक ज्ञान जो बोध में उतर गया, समझ में आ गया, उसे समझ कह सकते हैं, लेकिन जो ज्ञान अभी जानकारी के स्तर पर ही है, सूचना के तल पर ही है, बोध में नहीं उतरा, उसे समझ नहीं कह सकते।
अब हर आदमी का समझदानी का कटोरा एक साइज़ का नहीं होता।
यानि कि हर आदमी की चेतना का स्तर (level of perception) एक जैसा नहीं होता। इसकी वजह से एक बात का मतलब अलग-अलग लोग अलग तरीके से निकालते हैं।
एक बार एक डॉक्टर महोदय एक शराबखाने में गए और शराबियों को एक प्रयोग कर के दिखाया।
उन्होंने एक जिन्दा चाली (earthworm) को पहले साफ़ पानी में डाला। चाली को कुछ नहीं हुआ। उसी चाली को फिर शराब में डाला गया। चाली के टुकड़े टुकड़े हो गए।
उसके बाद डॉक्टर महोदय ने शराबियों से पूछा, इस प्रयोग से आप लोगों को क्या समझ में आया?
पीछे से एक शराबी ने जवाब दिया, इससे तो यही समझ में आता है कि, शराब पीने से पेट का चाली मर जायेगा।
अब बोलिये, क्या डॉक्टर महोदय यही समझाना चाहते थे?
इसीलिए कहा गया है:
:श्रुतिः विभिन्ना स्मृतयश्च भिन्ना
न एको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां
महाजनो येन गतः स पन्थाः”
अर्थात्
जो सुना गया वो अलग-अलग हो जाता है। जो याद रखा गया वो भी अलग हो जाता है। एक भी मुनि नहीं है, जिसका वचन प्रमाण है। धर्म का तत्व गुहाओं में निहित है। महान लोग जिस रास्ते से गए हैं, वही मार्ग हैं।
निष्कर्ष यह कि ज्ञान उपलब्ध होते हुए भी “समझ” यानि जागृत चेतना परमावश्यक है।
अब देखते हैं कि यह “समझ” मिलेगा कहाँ से?
तो जितनी ही समझ हमें मिली है, कहाँ से मिली है?
हमारी आपकी “चेतना” का स्रोत क्या है?
परम-चेतना अर्थात् सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा अर्थात् परमात्मा अर्थात् शिव ही हमारी आपकी चेतना के स्रोत हैं।
अब सब्जी की दुकान में हीरे तो नहीं मिल सकते न?
इसीलिए यदि समझ चाहिए तो स्रोत से जुड़ना ही पड़ेगा।
शरीरधारी गुरु ज्ञान दे सकते हैं। किताबों में भी ज्ञान है। लेकिन समझ केवल शिव-गुरु की दया से ही संभव है।
तो आवश्यकता यह है कि हम अपनी चेतना को परम चेतना से जोड़ने की कोशीश करें।
इसके लिए शिव-गुरु की दया से प्रदत्त 3 सूत्र सहायक हैं:
1. दया मांगना:
हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये (मन ही मन)
2. चर्चा करना:
दूसरों को भी यह सन्देश देना कि, शिव मेरे गुरु हैं, आपके भी हो सकते हैं
3. नमन करना:
अपने गुरु को प्रणाम निवेदित करने की कोशीश करना। चाहें तो नमः शिवाय का प्रयोग कर सकते हैं (मन ही मन: साँस लेते समय नमः, छोड़ते समय शिवाय)
मुख्य बिंदु (Key Takeaways – ज्ञान और समझ)
- शाश्वत सत्य: ज्ञान और समझ का बोध जीवन में शांति प्रदान करता है।
- शिव गुरु: शिव को गुरु मानकर दया माँगने से जीवन के कष्ट मिटते हैं।
- 3 सूत्र: दया माँगना, चर्चा करना और नमः शिवाय जप ही शिव शिष्यता का सहज साधन है।
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